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केसरिया लहराता है

Deepak Narang

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खून से सींची धरती पर
        
                                                    
                            
अपना आधार बनाता है
बहती हवा में भारत वर्ष की
गौरव गाथा गाता है
आसमान के सीने पे बेधड़क
सूरज सी चमक दिखाता है
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है

केसरिया ने हर रण देखा है
मोक्ष का अंतिम क्षण देखा है
धर्म का जै जैकार सुना है
दुश्मन की ललकार सुना है
शिव तांडव और कृष्ण रास दिखा है
अपने हाथों इतिहास लिखा है
वीरों के अर्पित रक्त से माथे
तिलक लगाता है
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है

याद है राणा प्रताप केसरी
अशोक पश्चयताप केसरी
याद है चन्द्रगुप्त मौर्य केसरी
केसरी पद्मावती रानी थी
केसरी गोरा की कुर्बानी थी
याद है हर तलवार केसरी
नीले गगन पे धार केसरी
लक्ष्मीबाई और शिवाजी की
कुर्बानी याद दिलाता है
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है

जिसने डर को जीत लिया
केसरिया वो निडर मन भी है
समर्पित हुआ जो हँसते हँसते
केसरिया उसका तन भी है
जो भी इस केसरिया के
रंग में रंग जाता है
शीश तली पे धर करके
रण मे उतर जाता है
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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