अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं ने समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले
तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी
- अहमद नदीम क़ासमी
मुद्दत से ख़्वाब में भी नहीं नींद का ख़याल
हैरत में हूँ ये किस का मुझे इंतिज़ार है
- शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
'मीर' बंदों से काम कब निकला
माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग
- मीर तक़ी मीर
अब किसी तरह दिल नहीं लगता
घर में सब कुछ तो है सिवा घर के
- पूजा भाटिया
मौत ख़ामोशी है चुप रहने से चुप लग जाएगी
ज़िंदगी आवाज़ है बातें करो बातें करो
- अहमद मुश्ताक़
'मुनीर' इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी को
हमेशा एक सा होना नहीं है
- मुनीर नियाज़ी
Urdu Poetry: ये कैसे लोग हैं ये कौन सी 'अदावत है