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संवेदनाओं का गणित

Deepak Dixit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दुनियां को हमने अपने और परायों में बाँट रक्खा है
        
                                                    
                            
रिश्तों के चक्कर में इतनी रेल पेल और धक्का है

दूसरे का बच्चा रोये तो सर में दर्द होता है
अपना बच्चा रोता है तो दिल भी रोता है

हमारी संवेदनाएं रिश्तों बदलते ही कई बार अचानक बदल जाती हैं
जैसे अचानक चुनाव के बाद अक्सर एक दम से सरकार बदल जाती है

जब रिश्ता कुछ और हो तो सारा गणित ही बदल जाता है
फायदा होने की जगह पर भी नुकसान दिख जाता है
रोने वाले उदहारण में अगर रिश्ता बच्चे की जगह पत्नी का हो जाता है
तो फिर संवेदनाओं का गणित ही पूरी तरह से उल्टा हो जाता है

दूसरे की बीबी रोये तो दिल भी रोता है
अपनी बीबी रोती है तो सर में दर्द होता है

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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