जी चाहता है चलना, तय रास्तों से मीलो दूर
जी चाहता है उड़ना , उन मुक्त गगन की ओर
जी चाहता है बढ़ना, हिमखंडो की उस चोटी पर
जहाँ पहुँच ना सका कोई और ।।
जी चाहता है छुना, उस उड़ते बादल की डोर
जी चाहता है इंद्रधनुष- सी बनके, बिखरू चारों ओर
जी चाहता है कानन में नाचू, बन के मद मस्त मोर
जी चाहता है उड़ के हवा, लहराती जाऊँ सब ओर ।।
जी चाहता है बस खुल के "जी "लू ,रहूँ कोरी चमक से मीलो दूर ।
बस जी चाहता है ,बस जी चाहता है, और यही चाहता है
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