विज्ञापन

जी चाहता है

Deepa singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जी चाहता है चलना, तय रास्तों से मीलो दूर
        
                                                    
                            
जी चाहता है उड़ना , उन मुक्त गगन की ओर
जी चाहता है बढ़ना, हिमखंडो की उस चोटी पर
जहाँ पहुँच ना सका कोई और ।।

जी चाहता है छुना, उस उड़ते बादल की डोर
जी चाहता है इंद्रधनुष- सी बनके, बिखरू चारों ओर
जी चाहता है कानन में नाचू, बन के मद मस्त मोर
जी चाहता है उड़ के हवा, लहराती जाऊँ सब ओर ।।

जी चाहता है बस खुल के "जी "लू ,रहूँ कोरी चमक से मीलो दूर ।
बस जी चाहता है ,बस जी चाहता है, और यही चाहता है


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Parul Bhaktani

1636 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13423 कविताएं

View Profile