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कोई एक दिन

Chitra Panwar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोई एक दिन
        
                                                    
                            
कैसे निर्धारित हो सकता है
किसी को चाहने के लिए
एक दिन में मरा जा सकता है
कोई कैसे जी सकता है अपना पूरा जीवन
सिर्फ़ एक दिन में
हां ये जरूर है
कि देह के द्वार तक जाकर लौटा जा सकता है एक दिन में
मगर मन की कुंडी धैर्य की थपकी से ही खुलती है
एक दिन में युद्ध की घोषणा की जा सकती है

प्रेम प्रस्ताव का साहस तो कई रतजगों के बाद पैदा होता है
एक दिन के किसी एक मिनट में फाइल पर हुए
साहब के हस्ताक्षर के अनुपालनार्थ
बुलडोजर ध्वस्त कर सकता है
हंसती–खेलती बड़ी से बड़ी मानवीय बस्ती को
जिन्हें बनाने में कितनी इच्छाओं की हत्या हुई, कितने समझौते करने पड़े, कितनी पीढ़ियों का ख़्वाब पूरा हुआ
क्या फ़र्क पड़ता है!!
एक दिन में लाखों विशाल दरख़्त काटे जा सकते हैं
वैसे एक पौधे को ही उगने, दरख़्त बनने में लग जाते हैं लाखों दिन
एक दिन में विनाश हो सकता है
निर्माण नहीं
प्रेम धीमी आँच पर पकता है
तभी मिठास घुलती है इसमें
बनावटी फूलों में नहीं प्रेम की डाल पर खिले फूलों में धीरे–धीरे उतरती है खुशबू
तुम लहू नहीं मेहंदी की तरह बिखरना मेरी हथेलियों पर
रात के हर एक बीतते पहर की तरह चूमना मेरी बंद मुट्ठियों को
एक दिन में नफ़रत की जा सकती है प्रिये!
प्रेम हमारी उम्र की सीमाओं से परे का विषय है
प्रेम करने के लिए ये क्या
ओर कई जीवन भी मिल जाएं तो कम हैं!!
3 घंटे पहले
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