आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोई एक दिन

                
                                                         
                            कोई एक दिन
                                                                 
                            
कैसे निर्धारित हो सकता है
किसी को चाहने के लिए
एक दिन में मरा जा सकता है
कोई कैसे जी सकता है अपना पूरा जीवन
सिर्फ़ एक दिन में
हां ये जरूर है
कि देह के द्वार तक जाकर लौटा जा सकता है एक दिन में
मगर मन की कुंडी धैर्य की थपकी से ही खुलती है
एक दिन में युद्ध की घोषणा की जा सकती है

प्रेम प्रस्ताव का साहस तो कई रतजगों के बाद पैदा होता है
एक दिन के किसी एक मिनट में फाइल पर हुए
साहब के हस्ताक्षर के अनुपालनार्थ
बुलडोजर ध्वस्त कर सकता है
हंसती–खेलती बड़ी से बड़ी मानवीय बस्ती को
जिन्हें बनाने में कितनी इच्छाओं की हत्या हुई, कितने समझौते करने पड़े, कितनी पीढ़ियों का ख़्वाब पूरा हुआ
क्या फ़र्क पड़ता है!!
एक दिन में लाखों विशाल दरख़्त काटे जा सकते हैं
वैसे एक पौधे को ही उगने, दरख़्त बनने में लग जाते हैं लाखों दिन
एक दिन में विनाश हो सकता है
निर्माण नहीं
प्रेम धीमी आँच पर पकता है
तभी मिठास घुलती है इसमें
बनावटी फूलों में नहीं प्रेम की डाल पर खिले फूलों में धीरे–धीरे उतरती है खुशबू
तुम लहू नहीं मेहंदी की तरह बिखरना मेरी हथेलियों पर
रात के हर एक बीतते पहर की तरह चूमना मेरी बंद मुट्ठियों को
एक दिन में नफ़रत की जा सकती है प्रिये!
प्रेम हमारी उम्र की सीमाओं से परे का विषय है
प्रेम करने के लिए ये क्या
ओर कई जीवन भी मिल जाएं तो कम हैं!!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर