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नास्तिक की आख़िरी दलील

chandan kharwar

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                            नास्तिक की आख़िरी दलील
        
                                                    
                            

सब कहते हैं—
“नास्तिक प्रेम में पड़ तो गया,
अब अपनी महबूबा को माँगेगा किससे?
जिस ईश्वर को उम्रभर नकारता रहा,
उसी के दर पर जाकर सिर झुकाएगा क्या?”

मैं मुस्कुराया।

नहीं—
मैं उसे किसी ईश्वर से नहीं माँगूँगा।

क्योंकि जिसे मैंने कभी देखा नहीं,
उससे मैं उस शख़्स की तक़दीर क्यों माँगूँ
जिसे देखकर
मेरी सारी दलीलें ख़ामोश हो जाती हैं?

मैंने ईश्वर के होने से इनकार किया था,
मोहब्बत के होने से नहीं।

और शायद प्रेम ही वह जगह है
जहाँ आदमी को पहली बार समझ आता है
कि हर चीज़ को तर्क से जीत लेना
और किसी को अपने पास रख लेना,
एक ही बात नहीं।

मैं उसे पाना चाहता हूँ
मगर उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ नहीं।

मैं उसके लिए दुआ नहीं करूँगा
कि दुनिया उसे मेरे नाम कर दे;
मैं बस इतना चाहूँगा
कि अगर उसके दिल में भी मेरा कोई कोना है,
तो वह बिना किसी आसमानी फ़ैसले के
मुझे चुन ले।

और अगर वह मुझे न चुने
तो मैं अपने प्रेम को झूठा नहीं कहूँगा।

क्योंकि प्रेम का सच
मिल जाने में कहाँ है?

कभी-कभी प्रेम की सबसे पवित्र अवस्था
वह होती है—
जहाँ इंसान किसी को अपना कहे बिना भी
पूरी आत्मा से उसका हो जाता है।

तो पूछते हो—
“नास्तिक अपनी महबूबा को माँगेगा किससे?”

किसी भगवान से नहीं।

वह उसे माँगेगा भी नहीं।

वह उसके सामने खड़ा होकर
सिर्फ़ इतना कहेगा

“तुम्हें पाने की मेरी इच्छा है,
तुम पर अधिकार नहीं।
तुम मेरे साथ रहो—यह मेरी ख़्वाहिश है,
मगर तुम ख़ुश रहो—
यह मेरे प्रेम की आख़िरी शर्त है।”

और उस दिन शायद
नास्तिक पहली बार समझेगा

ईश्वर को न मानना
और प्रार्थना से परे होना
एक ही बात नहीं।

क्योंकि कुछ प्रार्थनाएँ
हाथ जोड़कर नहीं होतीं

कुछ प्रार्थनाएँ
किसी को आज़ाद छोड़ देने में पूरी होती हैं।
9 घंटे पहले
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