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गरीबी सिर्फ़ जेब में नहीं होती

chandan kharwar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब गरीबी
        
                                                    
                            
सिर्फ़ फटी हुई जेबों में नहीं दिखती,
कभी-कभी
वह चमकती हुई स्क्रीन पर भी बैठी होती है।

हाथ में स्मार्टफ़ोन है,
हर महीने रिचार्ज है,
कपड़ों पर ब्रांड का नाम है,
जेब में तस्वीरें हैं
उन चीज़ों की
जिन्हें देखकर दुनिया कहे
“हाँ, इसकी भी हैसियत है।”

मगर उसी घर में
बच्चे की फीस बाकी है,
किताबें पुरानी हैं,
पढ़ाई के लिए
कभी पैसे नहीं होते।

अजीब हिसाब है
ज़रूरत के समय
जेब खाली मिलती है,
और दिखावे के समय
कहीं से पैसे आ जाते हैं।

बच्चे की किताब के लिए
सौ रुपये भारी पड़ते हैं,
लेकिन त्योहार आए
तो घर की इज़्ज़त का सवाल है

कर्ज़ लेकर रस्म निभ जाएगी,
उधार लेकर दावत हो जाएगी,
गहना गिरवी रखकर
समाज को दिखा दिया जाएगा
“हम भी किसी से कम नहीं।”

बस एक चीज़
फिर भी नहीं खरीदी जाती
आने वाली पीढ़ी का भविष्य।
धर्म से मुझे शिकायत नहीं,
आस्था से भी नहीं।

शिकायत उस सोच से है
जहाँ भगवान के नाम पर
पैसा खर्च करना पुण्य समझा जाता है,

लेकिन बच्चे की शिक्षा पर खर्च
“अभी ज़रूरत नहीं” बन जाता है।
जहाँ कर्मकांड के लिए
पैसे मिल जाते हैं,

लेकिन कौशल सीखने के लिए
समय नहीं।
जहाँ समाज क्या कहेगा
यह सवाल इतना बड़ा है
कि बच्चा क्या बनेगा
यह सवाल छोटा पड़ जाता है।

और शायद
यहीं गरीबी अपनी दूसरी शक्ल पहनती है।
पहली गरीबी जेब की होती है,
दूसरी सोच की।

पहली गरीबी
मेहनत से मिट सकती है,
लेकिन दूसरी
पीढ़ियों तक चलती है।

क्योंकि जिस घर में
बच्चे को विरासत में
सिर्फ़ अभाव नहीं,
अभाव को स्वीकार करने की आदत
भी मिल जाए,

वहाँ गरीबी
सिर्फ़ आर्थिक स्थिति नहीं रहती
वह जीवन-दर्शन बन जाती है।
फिर बेटा वही करता है
जो पिता ने किया,

बेटी वही सीखती है
जो माँ ने सहा,
और अगली पीढ़ी
फिर उसी चक्र में
जन्म लेती है।

त्योहार आते हैं
खर्च बढ़ता है।
शादी आती है
कर्ज़ बढ़ता है।

समाज आता है
दिखावा बढ़ता है।
और साल बीत जाते हैं
पर जीवन नहीं बदलता।

कभी किसी बच्चे की
एक साल की फीस
उस घर की एक रात की दावत में चली जाती है।
कभी मोबाइल बदल जाता है,
लेकिन किताब वही रहती है।

कभी कपड़े नए हो जाते हैं,
लेकिन सपने पुराने।
और फिर हम कहते हैं
“गरीबी हमारी किस्मत है।”
नहीं।

हर गरीबी का कारण
सिर्फ़ गलत निर्णय नहीं होता
व्यवस्था, अवसरों की कमी, शिक्षा की कमी,
कम आय और सामाजिक असमानता भी
उसे जन्म देती हैं।

लेकिन जहाँ अवसर उपलब्ध हों,
वहाँ प्राथमिकताओं का सवाल
पूछना भी ज़रूरी है।
क्योंकि गरीबी से लड़ना
सिर्फ़ ज़्यादा कमाने का नाम नहीं।

कभी-कभी
यह तय करने का साहस भी है
कि कम पैसे में
पहले क्या बचाया जाए।

इज़्ज़त?
या भविष्य?
दिखावा?
या शिक्षा?
एक दिन की वाहवाही?
या पूरी ज़िंदगी की क्षमता?
और शायद
सबसे कठिन सवाल यही है

क्या हम अपने बच्चों को
वही जीवन देना चाहते हैं
जिससे हम स्वयं
बाहर निकलना चाहते थे?
अगर उत्तर “नहीं” है,

तो बदलाव
सरकार से पहले,
समाज से पहले,
किस्मत से पहले
घर की प्राथमिकताओं में शुरू होगा।

क्योंकि गरीबी का अंत
उस दिन नहीं होगा
जब हाथ में सबसे महँगा फ़ोन होगा।
वह उस दिन शुरू होगा
जब उसी हाथ में
एक किताब होगी

और उसे खरीदते समय
किसी को यह डर नहीं होगा
कि“लोग क्या कहेंगे?”
बल्कि गर्व होगा कि—

“मेरे बच्चे की ज़िंदगी
मुझसे थोड़ी बेहतर होगी।”
शायद असली समृद्धि
बड़ी गाड़ी में नहीं,

बड़े घर में नहीं,
महँगे कपड़ों में नहीं
उस दिन होगी
जब एक गरीब पिता
अपने बेटे से कह सके

“मेरे पास तुम्हें विरासत में
बहुत पैसा नहीं है,
लेकिन मैंने तुम्हें
वह शिक्षा दी है
जिससे तुम अपनी विरासत
खुद बना सको।”

और तब
गरीबी सिर्फ़ कम नहीं होगी,
उसकी अगली पीढ़ी
उससे बाहर निकलना सीख जाएगी।
4 घंटे पहले
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