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उम्मीद की खींचतान

brahmanand gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्मीद की खींचतान
        
                                                    
                            

टूटी हुई उम्मीदों को लेकर,
वह खाली पतीली चूल्हे पर चढ़ा देती है।
दो बच्चे हैं उनके सरोकार है,
उनका पेट है।
सरकार से उसकी विधवा पेंशन मिलती है।
पर महीने में 30 दिन होते हैं साहब।
सरकारी पेंशन तो 7 दिन तक चलती है।
23 दिन का तो बनवास रहता है।
हां उसने एक छोटी-मोटी नौकरी प्राइवेट स्कूल में कर ली है।
खर्चो के आगे प्राइवेट नौकरी का कद,
बहुत बौना है साहब।

मकान का किराया, गैस सिलेंडर ,बिजली का बिल,
राशन की उधारी।
उसकी उम्मीदों को तोड़ती रहती है।
शायद यही जीवन है।
इसी सोच में वह गुजरने वाले एक एक दिन,
के लिए अहसान मंद है।
जिंदगी में आवश्यकताओं की खींचतान ,
उसे रस्सी की तरह हर दिन खींचती रहती है।
-ब्रह्मानंद गुप्ता 
4 घंटे पहले
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