मैं नहीं होना चाहूँगा बरगद का पेड़,
और न ही चाहूँगा कि
मेरे ही विचारों की शाखाओं से
फिर कोई नया बरगद उग आए।
मैं होना चाहूँगा रातरानी—
जो एक रात में ही
अपनी महक को
चारों ओर बिखेर दे।
और फिर सुबह होते-होते
अपनी शाखाओं से अलग होकर
दे दे किसी नई कली को
खिलने का एक अवसर।
मैं नहीं चाहता
कि मेरे विचार मेरी पहचान बनकर
हमेशा मुझसे ही जुड़े रहें;
चाहता हूँ वे महकें,
फैलें,
और फिर मुझसे अलग होकर
किसी और के भीतर
एक नई शुरुआत करें।
क्योंकि शायद
विचारों का जीवित रहना
उन्हें दोहराने में नहीं,
बल्कि उन्हें छोड़ देने में है—
ताकि कोई नई कली
अपनी तरह से खिल सके।