मिलते जहाँ धरती और गगन,
आभासी यह दृष्टि-विचलन।
है भूल-भुलैया कल्पना-प्रवर,
मानना मिलन अवनि-अंबर।
इस पार है भ्रम और तन्हाई,
क्षितिज पार न जाने क्या होगा!
दृष्टि-सीमा के उस पार,
बसता शायद अद्भुत संसार।
बाहरी दुनिया या अन्तर्मन,
दिखता जैसे हो कोई स्वप्न।
इस पार दर्द और रुसवाई,
क्षितिज पार न जाने क्या होगा!
मिलें शायद बिछुड़े स्वजन,
जिनकी बंदगी करते यह जन।
पौराणिक पुरुष या परिलोक,
या ऋषि जो रचते ऋचा-श्लोक।
इस पार अवशेष उनकी यादें,
क्षितिज पार न जाने क्या होगा!
अंतरिक्ष-वासियों का परिवार,
कर पाते गर उनका दीदार।
सूर्य-चाँद का पृथ्वी पर आना,
कितना होता होगा सुहाना!
इस पार नियमबद्धता, देयता,
क्षितिज पार न जाने क्या होगा!
भाईचारे का मिल जाता मंत्र,
विश्व-शांति का कोई यंत्र।
क्षितिज पार की मिलती छाया,
होती दूर व्यभिचार की माया।
इस पार सहिष्णुता का अभाव,
क्षितिज पार न जाने क्या होगा!
- विजय बहादुर तिवारी