कहने को तो हम घर में सबसे
बड़े हो जाते हैं !
इस बुढ़ापे में हमारे अपने ही
हमें भूल जाते हैं !!
कहने को तो बुढ़ापे को दूसरा
बचपन कहते हैं!
लेकिन लोगों का असली चेहरा
हम इन्हीं दिनों देखते हैं!!
बच्चों के पहले बचपन में हम
मां बाप तो उन्हें प्यार से खिलाते हैं !
फिर क्यों वही बच्चे हमारे दूसरे
बचपन में हमें रूठ के रुलाते हैं !!
उनके बचपन में तो हम उन्हें भगवान
नजर आते हैं!
फिर क्यों हमारे बुढ़ापे में हम उनके
लिए बोझ बन जाते हैं!!
क्या बुढ़ापा भगवान की
दी हुई एक सजा है
या अपने ही बच्चों का
दूसरा मखोटा खोलने का
एक तरीका है!!
कभी कोई हमारे दिल से भी तो पूछे
कि जब हमारे अपने बच्चे ही हमें
अपने रूखेपन से परखते हैं !
तो हमारे पेट में आग और
आंखों में पानी के
कैसे बुलबुले उठते हैं!!