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घर सूना-सूना सा लगता है तेरे बिना,

Bhuneshwar Anant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर सूना-सूना सा लगता है तेरे बिना,
        
                                                    
                            
पड़ रहा है मुझे जुदाई का ज़हर पीना।
धधक रहा है तेरी याद में मेरा सीना,
मुश्किल हो गया है अब मेरा जीना।

लोग कहते हैं मुझे बावरा सा,
बस तू ही था मेरा एक सहारा सा।
कितना सुंदर था मेरा घर न्यारा सा,
अब तो लगता है सब कुछ पराया सा।

तितली कहती है मुझसे, न रह तू किनारे में,
देख, उंडू मैं तुझे इन बहारों में।
दौड़ लगा, जरा यार के शहरों में,
ना लिपट जा तू यादों के इन कफ़नों में।

हँसी छूट गई, मेरी आँखों से निकले आँसू,
कहाँ ढूँढ़ूँ मैं उसे, किस गली में जाऊँ?
जहाँ भी देखूँ मैं उसे पाने की आस में,
वहाँ सूनी गलियाँ ही पाऊँ।
- भुनेश्वर अनंत
20 घंटे पहले
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