आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

घर सूना-सूना सा लगता है तेरे बिना,

                
                                                         
                            घर सूना-सूना सा लगता है तेरे बिना,
                                                                 
                            
पड़ रहा है मुझे जुदाई का ज़हर पीना।
धधक रहा है तेरी याद में मेरा सीना,
मुश्किल हो गया है अब मेरा जीना।

लोग कहते हैं मुझे बावरा सा,
बस तू ही था मेरा एक सहारा सा।
कितना सुंदर था मेरा घर न्यारा सा,
अब तो लगता है सब कुछ पराया सा।

तितली कहती है मुझसे, न रह तू किनारे में,
देख, उंडू मैं तुझे इन बहारों में।
दौड़ लगा, जरा यार के शहरों में,
ना लिपट जा तू यादों के इन कफ़नों में।

हँसी छूट गई, मेरी आँखों से निकले आँसू,
कहाँ ढूँढ़ूँ मैं उसे, किस गली में जाऊँ?
जहाँ भी देखूँ मैं उसे पाने की आस में,
वहाँ सूनी गलियाँ ही पाऊँ।
- भुनेश्वर अनंत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
15 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर