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वह हमारे भीतर भी उग आएगा।

भावना सक्सैना

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहना चाहती हूँ
        
                                                    
                            

स्त्रियों, तुम घर से निकलना छोड़ दो,
छात्रों, तुम पढ़ना छोड़ दो।
भीतर-बाहर के युद्धों से घिरी यह दुनिया
बनती जा रही है जंगल।

कहना चाहती हूँ,
फिर भी नहीं कहूँगी—
राजनीति करनी नहीं आती
तो साँस लेना छोड़ दो,
क्योंकि तुम्हारी आह
बन जाएगी एक अवसर
उनके लिए
जिनका काम ही है
हर चीख में अपना नारा ढूँढ़ना।

कहना चाहती हूँ—
डरो मत,
पर डरना भी तो स्वाभाविक है।
जब सड़कें सवाल करने लगें,
जब घरों की चौखटें
सुरक्षा की गारंटी न रहें,
जब किताबों के पन्नों से
बारूद की गंध आने लगे,
तो शब्द भी काँपते हैं।

कहना चाहती हूँ—
चुप मत रहो,
लेकिन यह भी जानती हूँ
कि तुम्हारी आवाज़ का
हिसाब माँगने वाले
बहुत हैं,
तुम्हारी आवाज़ सुनने वाले
बहुत कम।

इसलिए नहीं कहूँगी
कि घर से मत निकलो,
किताबें मत खोलो,
सवाल मत पूछो,
अपने सपनों को तह करके
किसी संदूक में रख दो।

नहीं कहूँगी।

क्योंकि जंगल चाहे जितना घना हो,
रास्ते खत्म नहीं होते।
अँधेरा चाहे जितना गहरा हो,
सुबह अपना रास्ता खोज लेती है।

और शायद
हमें यही करना है—
डर के बावजूद निकलना,
सवालों के बावजूद पढ़ना,
शोर के बीच
अपनी आवाज़ बचाए रखना।

क्योंकि अगर
स्त्रियाँ घरों में बंद हो जाएँगी,
छात्र किताबें छोड़ देंगे,
और सवाल पूछने वाले
साँस लेना छोड़ देंगे—
तो जंगल केवल बाहर नहीं होगा,
वह हमारे भीतर भी उग आएगा।

कहना चाहती हूँ—
इसलिए कहूँगी।

साँस लो।
पढ़ो।
बाहर निकलो।
सवाल करो।
और इस जंगल में
एक-दूसरे के लिए
रास्ता बनाते चलो।
एक घंटा पहले
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