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अकेले राह में मंज़िल कहाँ है।

Azhar Sabri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अकेले राह में मंज़िल कहाँ है।
        
                                                    
                            
जो मिल जाएँ तो राहें कारवाँ हों।

अलग रहकर कहाँ ताक़त बचेगी,
मिलें तिनके तो फिर इक आशियाँ हो।

बिखरकर ख़ाक में मिलना है सबको,
जो जुड़ जाएँ तो फिर हम इक जहाँ हो।

न बाँटो रंग में इस बाग़-ए-हस्ती,
हर इक रंगत यहाँ इक गुलसिताँ हो।

सँवर जाएँगी दुनिया की ये राहें,
अगर हर दिल सभी पर मेहरबाँ हो।

दीवारें बुग़्ज़ की ढहती रहें सब,
दिलों के बीच बस इक साएबाँ हो।

चलो मिलकर नया इतिहास लिख दें,
हमारी मुट्ठियों में आसमाँ हो।

न उजड़े फिर कभी अपना ये गुलशन,
अगर हर दिल हर इक का पासबाँ हो।
- अज़हर साबरी
10 घंटे पहले
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