आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अकेले राह में मंज़िल कहाँ है।

                
                                                         
                            अकेले राह में मंज़िल कहाँ है।
                                                                 
                            
जो मिल जाएँ तो राहें कारवाँ हों।

अलग रहकर कहाँ ताक़त बचेगी,
मिलें तिनके तो फिर इक आशियाँ हो।

बिखरकर ख़ाक में मिलना है सबको,
जो जुड़ जाएँ तो फिर हम इक जहाँ हो।

न बाँटो रंग में इस बाग़-ए-हस्ती,
हर इक रंगत यहाँ इक गुलसिताँ हो।

सँवर जाएँगी दुनिया की ये राहें,
अगर हर दिल सभी पर मेहरबाँ हो।

दीवारें बुग़्ज़ की ढहती रहें सब,
दिलों के बीच बस इक साएबाँ हो।

चलो मिलकर नया इतिहास लिख दें,
हमारी मुट्ठियों में आसमाँ हो।

न उजड़े फिर कभी अपना ये गुलशन,
अगर हर दिल हर इक का पासबाँ हो।
- अज़हर साबरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर