विज्ञापन

कब से राह निहारे अँखियाँ!

Ashutosh Amit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम बिन प्यासी मेरी अँखियाँ
        
                                                    
                            
जाग-जाग कर काटी रतियाँ
तुम बिन सूनी सारी नगरी
सूनी सेज है, सूनी डगरी
धड़कत है बहुत तेज़ ये छतियाँ
तुम आते तो मनती दिवाली
रंग-राग की मचती होली
जंचती आँगन में पीक की बोली
खेलते हम-तुम आँख-मिचौली
थकी अनाड़ी दुखियाँ अँखियाँ
आश था आते तुम सावन में
झरी लगी जब मम आँगन में
गरज-गरज घन घरराते
मेंढक टर-टर राग सुनाते
झिंगुर गाते गीत मनोहर
ऐसे में तुम आते प्रियवर
कब से राह निहारे अँखियाँ!
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ipsita Bhadauria

37 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10782 कविताएं

View Profile