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कब से राह निहारे अँखियाँ!

                
                                                         
                            तुम बिन प्यासी मेरी अँखियाँ
                                                                 
                            
जाग-जाग कर काटी रतियाँ
तुम बिन सूनी सारी नगरी
सूनी सेज है, सूनी डगरी
धड़कत है बहुत तेज़ ये छतियाँ
तुम आते तो मनती दिवाली
रंग-राग की मचती होली
जंचती आँगन में पीक की बोली
खेलते हम-तुम आँख-मिचौली
थकी अनाड़ी दुखियाँ अँखियाँ
आश था आते तुम सावन में
झरी लगी जब मम आँगन में
गरज-गरज घन घरराते
मेंढक टर-टर राग सुनाते
झिंगुर गाते गीत मनोहर
ऐसे में तुम आते प्रियवर
कब से राह निहारे अँखियाँ!
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3 घंटे पहले

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