तुम्हारा दिया चांदी का है मेरा माटी का
क्या फर्क पड़ेगा,
तिमिर को ही तो भगाना है।
एक दीया जहाँ पर तुम रक्खो एक दीया मैं रक्खूं।
आ गए है कुछ लौटके अपने घर को ,कुछ को लाना है
इस बार हर घर दीवाली लानी है।
नफरतो को गले मिल भागाना है,
हर घर दीवाली मानानी है।
मेरी डेहरी में आके पैर तुम रक्खो,तेरी डेहरी में मैं रक्खूं।
एक दीया जहाँ पर तुम रक्खो एक दीया मैं रक्खूं।
जलते रहे है सदियों से दीये...
दुष्यंत के महलों पर
इस बार सुदामा के झोपड़े में भी
एक दिया तुम रक्खो एक दिया मैं रक्खूं।
एक दीया जहाँ पर तुम रक्खो एक दीया मैं रक्खूं।
मानो उतरे है तारे सभी आसमां से,धरा को सजाने
बिखरे छितरे है आसमां की भांति ,यहां भी
बस पंक्तियों में सजाना है।
पंक्ति में एक तारा तुम रक्खो ,एक तारा मैं रक्खूं।
एक दीया जहाँ पर तुम रक्खो एक दीया मैं रक्खूं।
पटाखों के शोर में दब ना जाये...ये खुशियां
खामोश है वो, जो आज भी
खुशियों से सारे उन शहर को नहलाना है
बस एक केओंठ में खुशी तुम रक्खो,एक के ओंठ में मैं रक्खूं।
एक दीया जहाँ पर तुम रक्खो एक दीया मैं रक्खूं।
- अशोक सिंह 'अश्क़'
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें