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मेरी एक नज़्म

अशोक दर्द

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            Meri एक najm
        
                                                    
                            


नज़्म
वो शमां वो उड़ते परवाने बस्ती से।
चले गए सब यार पुराने बस्ती से ।।

सब बहकावे में है आकर रूठ गए।
फूलों के मंजर सुहाने बस्ती से।।

प्यार मोहब्बत और सौहार्द की खानें।
कौन ले गया लूट खजाने बस्ती से ।

नफरत की आंधी के उठते ही सारे ।
छुप गए अपने और बेगाने बस्ती से ।।

प्यार की पींगे और शोहरत की रिमझिम।
चले गए मौसम सुहाने बस्ती से।।

अपनी जो तहजीब थी मिलकर रहने की ।
कौन ले गया लूट न जाने बस्ती से।।

इक दिन दुनिया वालो हम बंजारे भी।
चले जाएंगे छोड़ ठिकाने बस्ती से।।
-अशोक दर्द
एक दिन पहले
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