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मेरी एक नज़्म

                
                                                         
                            Meri एक najm
                                                                 
                            


नज़्म
वो शमां वो उड़ते परवाने बस्ती से।
चले गए सब यार पुराने बस्ती से ।।

सब बहकावे में है आकर रूठ गए।
फूलों के मंजर सुहाने बस्ती से।।

प्यार मोहब्बत और सौहार्द की खानें।
कौन ले गया लूट खजाने बस्ती से ।

नफरत की आंधी के उठते ही सारे ।
छुप गए अपने और बेगाने बस्ती से ।।

प्यार की पींगे और शोहरत की रिमझिम।
चले गए मौसम सुहाने बस्ती से।।

अपनी जो तहजीब थी मिलकर रहने की ।
कौन ले गया लूट न जाने बस्ती से।।

इक दिन दुनिया वालो हम बंजारे भी।
चले जाएंगे छोड़ ठिकाने बस्ती से।।
-अशोक दर्द
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3 घंटे पहले

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