चुभने लगी ज़िगर में यादों
की किर्चियाॅं।
ख़ामोश है नज़र और ग़म
की शाम है।।
दिल की नमीं पलक को
भिगोते हुए चली।
आंखों में है चुभन और दिल
में मलाल है।।
रूक सी गयी हैं ज़िंदगी गुज़रे
ज़माने में।
सांसों में है तपिश और लब
बेजुबान है।।
दिल वारने की क़ीमत दिल
ने चुकाई यूं।
लगीं द़ाग हसरतों में ख़्वाब
शर्मशार है।।
कब से संभाले रक्खा हैं दबी
ख़्वाहिशों को दिल।
वक्त ठहर सा गया है और
हैरान हैं।।