आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चुभने लगी ज़िगर में

                
                                                         
                            चुभने लगी ज़िगर में यादों
                                                                 
                            
की किर्चियाॅं।
ख़ामोश है नज़र और ग़म
की शाम है।।
दिल की नमीं पलक को
भिगोते हुए चली।
आंखों में है चुभन और दिल
में मलाल है।।
रूक सी गयी हैं ज़िंदगी गुज़रे
ज़माने में।
सांसों में है तपिश और लब
बेजुबान है।।
दिल वारने की क़ीमत दिल
ने चुकाई यूं।
लगीं द़ाग हसरतों में ख़्वाब
शर्मशार है।।
कब से संभाले रक्खा हैं दबी
ख़्वाहिशों को दिल।
वक्त ठहर सा गया है और
हैरान हैं।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर