विज्ञापन

एक तूफान दिखा रहा है रौब मुझे

Arun Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक तूफान दिखा रहा है रौब मुझे
        
                                                    
                            
आ रहा है अपनी पीठ थपथपाए हुए

जिसके इंतजार मे मंजिल ख़ुद रुकी थी
वो अभी उठा है आँखे झपझपाए हुए

ये आदम तुझसे डर गए है पंछी नीड़ के
कैसे रहते है देखो सकपकाए हुए

ये कैसी मुश्किलें है जिंदगी-ए-सफर मे
दिखती हर आँख है आंसू टपकाए हुए

ये तुझको किसने लूटा है 'कुँवर'
हर जगह जाता है तो मुंह लटकाए हुए

-कुँवर अरुण
बदायूं

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all