एक तूफान दिखा रहा है रौब मुझे
आ रहा है अपनी पीठ थपथपाए हुए
जिसके इंतजार मे मंजिल ख़ुद रुकी थी
वो अभी उठा है आँखे झपझपाए हुए
ये आदम तुझसे डर गए है पंछी नीड़ के
कैसे रहते है देखो सकपकाए हुए
ये कैसी मुश्किलें है जिंदगी-ए-सफर मे
दिखती हर आँख है आंसू टपकाए हुए
ये तुझको किसने लूटा है 'कुँवर'
हर जगह जाता है तो मुंह लटकाए हुए
-कुँवर अरुण
बदायूं
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