आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक तूफान दिखा रहा है रौब मुझे

                
                                                         
                            एक तूफान दिखा रहा है रौब मुझे
                                                                 
                            
आ रहा है अपनी पीठ थपथपाए हुए

जिसके इंतजार मे मंजिल ख़ुद रुकी थी
वो अभी उठा है आँखे झपझपाए हुए

ये आदम तुझसे डर गए है पंछी नीड़ के
कैसे रहते है देखो सकपकाए हुए

ये कैसी मुश्किलें है जिंदगी-ए-सफर मे
दिखती हर आँख है आंसू टपकाए हुए

ये तुझको किसने लूटा है 'कुँवर'
हर जगह जाता है तो मुंह लटकाए हुए

-कुँवर अरुण
बदायूं

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर