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चेहरों की भीड़ में कोई अपना नहीं मिला

Arti Pundir

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या कहें, कितने लाचार हुए हम,
        
                                                    
                            
वक़्त की धारा में अख़बार हुए हम।

सच की राहों पर चलने की चाह में,
झूठ के सजते हुए बाज़ार हुए हम।

बिकते हुए दिखे, अपनों में थे शुमार,
ख़ुद भी दुनिया के ख़रीदार हुए हम।

ताउम्र जिनके वास्ते आवाज़ उठाई,
उन्हीं के लिए अब बेकार हुए हम।

जिस शहर में इंसानियत ढूँढते रहे,
उसी शहर के इश्तिहार हुए हम।

आईना सच का जिनको भी दिखाया,
उन्हीं के लिए गुनहगार हुए हम।

यहां दर्द सुनाएँ तो भला कौन सुनेगा,
अपनों में रहकर लाचार हुए हम।

चेहरों की भीड़ में कोई अपना नहीं मिला,
तन्हाइयों के दरमियाँ बेकरार हुए हम।

जो मिल न सका उम्र भर की दुआओं में,
उसी एक सच के तलबगार हुए हम।
 
3 घंटे पहले
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