आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चेहरों की भीड़ में कोई अपना नहीं मिला

                
                                                         
                            क्या कहें, कितने लाचार हुए हम,
                                                                 
                            
वक़्त की धारा में अख़बार हुए हम।

सच की राहों पर चलने की चाह में,
झूठ के सजते हुए बाज़ार हुए हम।

बिकते हुए दिखे, अपनों में थे शुमार,
ख़ुद भी दुनिया के ख़रीदार हुए हम।

ताउम्र जिनके वास्ते आवाज़ उठाई,
उन्हीं के लिए अब बेकार हुए हम।

जिस शहर में इंसानियत ढूँढते रहे,
उसी शहर के इश्तिहार हुए हम।

आईना सच का जिनको भी दिखाया,
उन्हीं के लिए गुनहगार हुए हम।

यहां दर्द सुनाएँ तो भला कौन सुनेगा,
अपनों में रहकर लाचार हुए हम।

चेहरों की भीड़ में कोई अपना नहीं मिला,
तन्हाइयों के दरमियाँ बेकरार हुए हम।

जो मिल न सका उम्र भर की दुआओं में,
उसी एक सच के तलबगार हुए हम।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
47 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर