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मेरी पृथ्वी...

Anurag Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वीर धरा यह
        
                                                    
                            
कांप उठी
हर कालखंड में
सिहर रही
इसकी मनोव्यथा को
मिलकर तुम सुलझाओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ

चलना मुश्किल अब एक पग है
भट्ठी में तपता सारा जग है
कोशिश करो जी जान से तुम
एक बार तो इसे बचाओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ

शाखों पे किसकी झूलोगे
फल खाकर किसके फूलोगे
इस वातावरण संतुलन के
आसार ही न मिटाओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ

जल का कहीं निशान नही
मारा-फिरता है किसान कहीं
हरित क्रांति का प्यारा परचम
तुम फिर एक बार लहराओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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