वीर धरा यह
कांप उठी
हर कालखंड में
सिहर रही
इसकी मनोव्यथा को
मिलकर तुम सुलझाओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ
चलना मुश्किल अब एक पग है
भट्ठी में तपता सारा जग है
कोशिश करो जी जान से तुम
एक बार तो इसे बचाओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ
शाखों पे किसकी झूलोगे
फल खाकर किसके फूलोगे
इस वातावरण संतुलन के
आसार ही न मिटाओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ
जल का कहीं निशान नही
मारा-फिरता है किसान कहीं
हरित क्रांति का प्यारा परचम
तुम फिर एक बार लहराओ
चलो अब तो पेड़ लगाओ
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