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मैं पापा की कॉपी हूँ।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं पापा की कॉपी हूँ,
        
                                                    
                            
पर हर कॉपी में
कुछ पन्ने अपने भी होने चाहिए।

कुछ मैंने भी बचाकर रखे,
किताबों-कॉपियों के अंदर से ज़्यादा
मुझे उसका चेहरा अच्छा लगता है।

वो चेहरा
जो मेरा भी हो सकता है—
उन यादों का,
उन बातों का
जो मैंने भी कभी जी हैं।

उन अनजानी राहों का,
जो अंदर कहीं मिलती हैं,
जो मेरे साथ
कहीं भी निकल पड़ती हैं।

कुछ आदतें उनकी
मुझमें चली आईं,
कुछ मैंने
रास्ते में ही बदल दीं।

मुझे वो ठहराव पसंद आता है,
अनजानी राहों में
खुद से मिल जाना भाता है।

मैं चाय पर चर्चा करती हूँ,
खुद को अपने दर्पण में देखती हूँ।

मैं अपनी आँखों की भाषा हूँ,
चेहरे की मुस्कान हूँ।

उनकी लिखावट में
कुछ शब्द मेरे हैं,
पर अपनी कहानी
मैं अपनी तरह लिखना चाहती हूँ।

मैं हर रंग को
उसमें भरना चाहती हूँ—
वो रंग
जो उधार के ही सही।

मैं हाथों की लकीरों को
बदलना चाहती हूँ,
वो कुछ लकीरें
जो थोड़ा-बहुत बताती हैं।

जो लकीरें
उनकी कहानी कहती हैं,
उनमें अपनी कहानी की
कुछ नई लकीरें
जोड़ना चाहती हूँ।
2 घंटे पहले
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