लोग पी रहे बीड़ी सिगरेट खुलेआम हैं
लोग लगा रहे रेट सबका सरेआम हैं
बिगड़ैल बबुए,बिगड़ैल लोग तमाम हैं
समाज छोड़ कर जाऊं मैं किधर?
धुआं इधर, धुआं उधर
मत पूछो धुआं किधर?
सारे बाजार में धुआं
सारे संसार में धुआं
कहीं वाहनों का धुआं
कहीं चिमनियों का धुआं
कहीं चूल्हों का धुआं
सांस इसी में लेना हैं
जी इसी में लेना है
दो दिन की जिंदगी
चार दिन की जिंदगी
बड़ों की दरिंदगी
सहें हम कब तक?
सहते रहें हम कब तक?
पहले खुद को सुधार लेना है
फिर सबको सुधार देना है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'