आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धुआं धुआं है

                
                                                         
                            लोग पी रहे बीड़ी सिगरेट खुलेआम हैं
                                                                 
                            
लोग लगा रहे रेट सबका सरेआम हैं
बिगड़ैल बबुए,बिगड़ैल लोग तमाम हैं
समाज छोड़ कर जाऊं मैं किधर?
धुआं इधर, धुआं उधर
मत पूछो धुआं किधर?
सारे बाजार में धुआं
सारे संसार में धुआं
कहीं वाहनों का धुआं
कहीं चिमनियों का धुआं
कहीं चूल्हों का धुआं
सांस इसी में लेना हैं
जी इसी में लेना है
दो दिन की जिंदगी
चार दिन की जिंदगी
बड़ों की दरिंदगी
सहें हम कब तक?
सहते रहें हम कब तक?
पहले खुद को सुधार लेना है
फिर सबको सुधार देना है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
51 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर