स्वयं अनपढ़ रह कर मां ने मुझे पढ़ाया
लाखों दुःख सह कर मां ने मुझे बढ़ाया
एक फुटी कौड़ी न थी जब घर में
तब पढ़ने को निकला मैं शहर में
गिरवी रख कर कान की कनबाली
गिरवी रख कर वह फुलहा थाली
है मां मुझे उस भयंकर दुःख में पढ़ाने वाली
है मां मुझे उस भयंकर गरीबी से निकालने वाली
कैसे उसका गुन गाऊं?
क्या क्या व्यथा सुनाऊं?
उस मां को मेरा प्रणाम
सुबह शाम और आठों जाम।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'