आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अनपढ़ मेरी मां

                
                                                         
                            स्वयं अनपढ़ रह कर मां ने मुझे पढ़ाया
                                                                 
                            
लाखों दुःख सह कर मां ने मुझे बढ़ाया
एक फुटी कौड़ी न थी जब घर में
तब पढ़ने को निकला मैं शहर में
गिरवी रख कर कान की कनबाली
गिरवी रख कर वह फुलहा थाली
है मां मुझे उस भयंकर दुःख में पढ़ाने वाली
है मां मुझे उस भयंकर गरीबी से निकालने वाली
कैसे उसका गुन गाऊं?
क्या क्या व्यथा सुनाऊं?
उस मां को मेरा प्रणाम
सुबह शाम और आठों जाम।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर