मैं थक गई हूं
फिर भी चल रही हूं,
मैं खुद को खो रही हूं
फिर भी चल रही हूं,
मै ताना ढो रही हूं
फिर भी चल रही हूं ,
मैं उम्मीदें ढो रही हूं
फिर भी चल रही हूं
मैं मां के सपनों को बुन रही हूं
मगर मैं थक गई हूं,
उनके सपनों को बुन रही हूं
अपने सपनों की ऊन से ,
उन्हें सींच रही हूं
अपने बचपन के त्याग से,
मैं थक गई हूं और
इस बार उनकी नजरों मे रुक गई हूं
क्यों बार बार मुझे अपने आप को साबित करना होता है?
क्या मेरा कहना काफी नहीं होता है,
क्यों मुझसे ज्यादा लोग क्या कहेंगे की चिंता मा को खाती है?
क्या मेरी छोटी छोटी सफलता उन्हे सुकून नहीं दिलाती है,
मैं अब थक गई हूं
अपना पथ भटक गई हूं