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दोहा-रचना~हर सोच के पीछे एक सफ़र

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर सोच के मूल में, छिपा हुआ इतिहास।
        
                                                    
                            
बीते पल की छाँव से, उपज रहा विश्वास॥

धूप मिली तो सोच में, आया नया निखार।
दुःख की आँच में तपे, मन के भाव हजार॥

ठोकर ने सिखला दिया, जीवन का व्यवहार।
गिरकर जिसने सीख ली, बढ़ता वह हर बार॥

आँसू बनकर बह गया, मन का संचित भार।
दर्द शब्द जब बन गया, खिल उठा विचार॥

कुछ रिश्ते दे जाएँ सुख, कुछ दे जाएँ पीर।
दोनों मिलकर गढ़ रहे, मन की नई लकीर॥

बीते कल की धूल से, उठता नया विचार।
अनुभव की भट्ठी में, तपता मन हर बार॥

जो देखा, जो सह लिया, बनता जीवन-ज्ञान।
हर अनुभव दे जाता, अपनी एक पहचान॥

हर प्रश्न के गर्भ में, छिपा हुआ उत्तर।
मन जितना गहरा हुआ, गहरा उसका स्वर॥

राह कठिन हो सामने, मत होना लाचार।
पग-पग पर मिलती रही, जीवन की सौगात॥

मंज़िल केवल अंत नहीं, यात्रा भी है सार।
चलते-चलते मिल गया, खुद से अपना प्यार॥

किसी सोच को देखकर, मत करना अनुमान।
उसके पीछे हो सके, कोई अनकहा गान॥

हर चेहरे के पीछे है, अनुभव का संसार।
हर मौन के भीतर छिपा, भावों का विस्तार॥

सोच बदलती दृष्टि को, दृष्टि बदलती राह।
जैसा मन का भाव हो, वैसी दिखती चाह॥

हर सोच के पीछे सदा, चलता कोई दौर।
कल की स्मृतियाँ साथ ले, बढ़ता मन हर ओर॥

जीवन एक सफ़र है, सोच उसकी चाल।
पग-पग पर मिलते यहाँ, अनुभव के प्रतिफल॥

हर सोच के पीछे छिपा, जीवन का विस्तार।
मन की गहरी पगडंडी, ले जाती उस पार॥
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
5 घंटे पहले
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