विज्ञापन

दो दिन की जिन्दगी ही तो है

Amrita Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्यूूूं बर्बाद करे
        
                                                    
                            
दो दिन की जिन्दगी ही तो है
हमारे माँ-बाप को
हमसे उम्मीद ही तो है
फिर इस दो दिन को बर्बाद क्यूूूं करे
क्यूूूं ना इन दो दिनों में अपने माँ-बाप का नाम रोशन
करे
दो दिन को संघर्ष और खुशी से बिताना है
और जो कुछ नहीं समझते हमें
उन्हें कुछ समझा जाना है
मारने दो ताने जो मारते हैं
बार-बार हारने वाले ही तो हार नहीं मानते
है।
चलो अपनी जिदंगी को अच्छे से सँवारते हैं
इस छोटी-छोटी समस्याओं को जड़ से उखाड़ते हैं
अब बस परिश्रम और संघर्ष करना है
इस दो दिन की जि़न्दगी में अपना नाम रोशन करना है।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all