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सावन

Amit Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धरती जब पानी को तरसे
        
                                                    
                            
सूख जाये जब जल पोखर से
पछी कलरव करें जब डर से
मेढ़क निकलें अपने घर से
बारिश आती है अम्बर से
बादल घुमड़-घुमड़ कर बरसें
पानी चूता सबके सर से
बोलो बच्चों किस शावर से
बर्वे जब जलेबियों पर बरसें
बिन छाता न निकलो घर से
पैदल चल पाओ न डर से
सड़कें भरी रहें कीचर से
निकलें न फिर पानी घर से
स्कूल न लगें पानी के डर से
घर गिर जाए एक भंवर से
सावन में ही पानी बरसे

 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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