चंद पत्तियों की खातिर आँसू न यूँ बहाइये,
है आपका समय तो कुछ पेड़ ही लगाइये,
टुकड़ो में नहीं पलते सपनें सुनहरे कल के,
हमको तो जान पड़ते आप आदमी कम अकल के,
कुछ झाड़ियों की खातिर करते हैं आप धरना,
कुछ लोग काटते हैं सबको पड़ेगा भरना,
हैं पेड़ भी जरूरी हमको है ये समझना,
सब पीढ़ियों की खातिर हमको पड़ेगा लड़ना,
जो पेड़ काटते हैं उनको है ये समझना,
चंद कौड़ियों की खातिर उजड़ा है चमन अपना,
जिसके लिए जतन से देखा था हमने सपना,
सब हो गया पराया दिखता न कोई अपना,
टुकड़ो में जी रहे हैं टुकड़ो में न बिताइये,
है आपका समय तो कुछ पेड़ ही लगाइये।
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