विज्ञापन

किसान

Amit Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसान होता था कभी धरती की शान,
        
                                                    
                            
अब तो खुद ही रहता है वो इतना हैरान-परेशान,
कि कर्ज चुकाते-चुकाते निकल जाती है उस बिचारे की जान,
और लगता है कर्ज अबतो जाने में भी शमशान,


किसान होता था कभी धरती की शान,
खेती करते-करते हो जाती हैं अब उसकी हड्डियाँ पिसान,
फिर भी नहीं जुटा पाता वो पेट भरने का सामान
सरकारें कहती हैं कि हम मिटा देंगे खेती का नामो-निशान,
और खुश हो जायेगा हर तबके का दुखी होता किसान,
लेकिन वो न जानें कि खेती में बसती है उसकी जान,
अगर खेती ही न रहेगी तो कैसे जिंदा रहेगा किसान,
किसान होता था कभी धरती की शान।

युँ तो तिल-तिल के जीता है हर रोज किसान,
खुद न खाये पर वो रहता है अपनी खेती पर मेहरबान,
क्योंकि खेती में ही तो बसती है उसकी जान,
किसान होता था कभी धरती की शान।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Nema Ram

141 कविताएं

View Profile