किसान होता था कभी धरती की शान,
अब तो खुद ही रहता है वो इतना हैरान-परेशान,
कि कर्ज चुकाते-चुकाते निकल जाती है उस बिचारे की जान,
और लगता है कर्ज अबतो जाने में भी शमशान,
किसान होता था कभी धरती की शान,
खेती करते-करते हो जाती हैं अब उसकी हड्डियाँ पिसान,
फिर भी नहीं जुटा पाता वो पेट भरने का सामान
सरकारें कहती हैं कि हम मिटा देंगे खेती का नामो-निशान,
और खुश हो जायेगा हर तबके का दुखी होता किसान,
लेकिन वो न जानें कि खेती में बसती है उसकी जान,
अगर खेती ही न रहेगी तो कैसे जिंदा रहेगा किसान,
किसान होता था कभी धरती की शान।
युँ तो तिल-तिल के जीता है हर रोज किसान,
खुद न खाये पर वो रहता है अपनी खेती पर मेहरबान,
क्योंकि खेती में ही तो बसती है उसकी जान,
किसान होता था कभी धरती की शान।
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