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बारिश......

Alok Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल रात की बारिश,
        
                                                    
                            
मुझसे कुछ कह रही थी ।
चिंता का पर्वत लेकर,
वह यूं ही बह रही थी ।।

कहती है- तुम मुझको बह जाने देते हो ।
अरे! सूखा जैसी समस्या को क्यों आने देते हो ।।

तुम मुझे आज बचाओ,
मैं तुम्हारा कल बचाऊंगी ।
छोड़कर अपनी मिठास,
समंदर मैं जी ना पाऊंगी ।।

खैर! अब मुझमें मिठास कहां रही,
यह तुम लोगों की देन है ।
मेरी वर्षा, वर्षा नहीं रही,
अब तो एसिड रेन है ।।

भले लोग आगे के हैं,
फसलों से मिलवाते हैं ।
अब तो छेद धरा में कर,
अपनी प्यास बुझाते हैं ।।

तुम धरती माता का,
सीना छलनी करते हो ।
मैं वही हूं जिसके लिए,
तुम जीते मरते हो ।।

जल संकट से बचा सकती हूं,
मुझमें इतनी हिम्मत है ।
लेकिन तुम लोगों की नजरों में,
मेरी क्या कीमत है ।।

जब मुझे बुलाने वाले,
प्यारे पेड़ नहीं होंगे ।
कभी-कभी आऊंगी हंसने,
कितने अरमान बहे होंगे ।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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