कल रात की बारिश,
मुझसे कुछ कह रही थी ।
चिंता का पर्वत लेकर,
वह यूं ही बह रही थी ।।
कहती है- तुम मुझको बह जाने देते हो ।
अरे! सूखा जैसी समस्या को क्यों आने देते हो ।।
तुम मुझे आज बचाओ,
मैं तुम्हारा कल बचाऊंगी ।
छोड़कर अपनी मिठास,
समंदर मैं जी ना पाऊंगी ।।
खैर! अब मुझमें मिठास कहां रही,
यह तुम लोगों की देन है ।
मेरी वर्षा, वर्षा नहीं रही,
अब तो एसिड रेन है ।।
भले लोग आगे के हैं,
फसलों से मिलवाते हैं ।
अब तो छेद धरा में कर,
अपनी प्यास बुझाते हैं ।।
तुम धरती माता का,
सीना छलनी करते हो ।
मैं वही हूं जिसके लिए,
तुम जीते मरते हो ।।
जल संकट से बचा सकती हूं,
मुझमें इतनी हिम्मत है ।
लेकिन तुम लोगों की नजरों में,
मेरी क्या कीमत है ।।
जब मुझे बुलाने वाले,
प्यारे पेड़ नहीं होंगे ।
कभी-कभी आऊंगी हंसने,
कितने अरमान बहे होंगे ।।
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