संदूक में बंद साड़ी की जैसी स्त्री
संदूक से निकलने को बेताब स्त्री
पर मौसम ऐसा कोई आया ही नहीं
फिर कैसे आ सकती है बाहर स्त्री
कोई समय होता है कारण होता है
बिन बात खिल जाए तो खटके स्त्री
ओढ़े रहती तमाम बंदिशें अपनी, गैरों की
फिर बेवक्त कैसे बाहर आ सकती है स्त्री
वह लिखती अपनों की दुआओं को
उनके माथे की लकीरों को सँवारती स्त्री
कभी बच्चे, मायके, कभी ससुराल के लिए
अपने लिए तो कभी खिलती ही नहीं स्त्री
तड़के से करती तैयारी व्रत-उपवास की
भूखी-प्यासी चेहर पर सिकन न लाती स्त्री
थके पोत-पोर, माँगे दुआ सुहाग , बच्चों की
अनुष्ठान पूरा कर निढाल हो जाती स्त्री
उसके लिए ना कोई व्रत करे ना उपवास
जबकि इस जगत की रौनक है स्त्री
तस्वीरों में पूजते, जीवित नहीं उतनी खास
खुद भी तो अपनी खैर नहीं मनाती स्त्री