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सन्दूक में बंद साड़ी सी स्त्री

Alka Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            संदूक में बंद साड़ी की जैसी स्त्री
        
                                                    
                            
संदूक से निकलने को बेताब स्त्री
पर मौसम ऐसा कोई आया ही नहीं
फिर कैसे आ सकती है बाहर स्त्री

कोई समय होता है कारण होता है
बिन बात खिल जाए तो खटके स्त्री
ओढ़े रहती तमाम बंदिशें अपनी, गैरों की
फिर बेवक्त कैसे बाहर आ सकती है स्त्री

वह लिखती अपनों की दुआओं को
उनके माथे की लकीरों को सँवारती स्त्री
कभी बच्चे, मायके, कभी ससुराल के लिए
अपने लिए तो कभी खिलती ही नहीं स्त्री

तड़के से करती तैयारी व्रत-उपवास की
भूखी-प्यासी चेहर पर सिकन न लाती स्त्री
थके पोत-पोर, माँगे दुआ सुहाग , बच्चों की
अनुष्ठान पूरा कर निढाल हो जाती स्त्री

उसके लिए ना कोई व्रत करे ना उपवास
जबकि इस जगत की रौनक है स्त्री
तस्वीरों में पूजते, जीवित नहीं उतनी खास
खुद भी तो अपनी खैर नहीं मनाती स्त्री
 
एक वर्ष पहले
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Manju Sharma

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