आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सन्दूक में बंद साड़ी सी स्त्री

                
                                                         
                            संदूक में बंद साड़ी की जैसी स्त्री
                                                                 
                            
संदूक से निकलने को बेताब स्त्री
पर मौसम ऐसा कोई आया ही नहीं
फिर कैसे आ सकती है बाहर स्त्री

कोई समय होता है कारण होता है
बिन बात खिल जाए तो खटके स्त्री
ओढ़े रहती तमाम बंदिशें अपनी, गैरों की
फिर बेवक्त कैसे बाहर आ सकती है स्त्री

वह लिखती अपनों की दुआओं को
उनके माथे की लकीरों को सँवारती स्त्री
कभी बच्चे, मायके, कभी ससुराल के लिए
अपने लिए तो कभी खिलती ही नहीं स्त्री

तड़के से करती तैयारी व्रत-उपवास की
भूखी-प्यासी चेहर पर सिकन न लाती स्त्री
थके पोत-पोर, माँगे दुआ सुहाग , बच्चों की
अनुष्ठान पूरा कर निढाल हो जाती स्त्री

उसके लिए ना कोई व्रत करे ना उपवास
जबकि इस जगत की रौनक है स्त्री
तस्वीरों में पूजते, जीवित नहीं उतनी खास
खुद भी तो अपनी खैर नहीं मनाती स्त्री
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर