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भार्गव राम खण्डकाव्य

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब आयी वरात जनक नगरी,
        
                                                    
                            
विधिवत कीन्ह जनक अगवानी।
कुशध्वज राजा जनक भ्राता,
दशरथ कंधे बिठाये अगवानी।।

आगे आगे चल रहे गुरु वशिष्ठ,
अनुगामी थे उनके सब राजा।
हो रहा वरात नर्तन अति सुन्दर,
संगत ताल दे रहे विविध बाजा।।

रानी सुनयना स्वयं पहुँच गई,
जिस रथ पर दशरथ रानियाँ।
दासी साथ,साथ स्वागत माला,
कीन्हे अर्पित स्वागत माला।।

सभी रानियाँ राजा दशरथ,
आय बैठ गईं स्वयंबर सभा।
वैदिक रीति से सजी वेदियाँ,
पाणि ग्रहण अब बीच सभा।।

अब हो रही थी विदाई सीता की,
साथ उर्मिला, मांडवी श्रुतिकीर्ति।
अश्रुधारा बहे सुनयना चंद्रभागा,
जनक कुशध्वज भी न रोक सके।।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
8 घंटे पहले
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