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काल-चक्र और पुरुषार्थ

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यदि स्खलित हुआ तू पंथ-मध्य,
        
                                                    
                            
तो यह न दिशा का अंत समझ,
यह केवल एक विश्राम-क्षण,
पुरुषार्थ का नव-छंद समझ।

जो गिरकर पुनः सँभल न सका,
उस जीवन का उत्कर्ष कहाँ?
आघात सहे बिन जो निखरे,
उस माटी में वह स्पर्श कहाँ?

यह तम की सघन विभीषिका तो,
केवल प्रभात की आहट है,
कंटक-कीर्ण यह विकट मार्ग,
अमरत्व की जगमगाहट है।

तू भस्म नहीं, पावक है तू,
फिर क्यों हताश, क्यों मौन खड़ा?
तेरी अंतर-ज्वाला के आगे,
यह अंबर भी तो न टिका।

उठ, झाड़ रेणु, सम्मुख देख,
रण-भेरी का आह्वान हुआ,
तेरे ही दृढ़ संकल्पों से देख,
नव-इतिहास निर्माण हुआ।
7 घंटे पहले
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