यदि स्खलित हुआ तू पंथ-मध्य,
तो यह न दिशा का अंत समझ,
यह केवल एक विश्राम-क्षण,
पुरुषार्थ का नव-छंद समझ।
जो गिरकर पुनः सँभल न सका,
उस जीवन का उत्कर्ष कहाँ?
आघात सहे बिन जो निखरे,
उस माटी में वह स्पर्श कहाँ?
यह तम की सघन विभीषिका तो,
केवल प्रभात की आहट है,
कंटक-कीर्ण यह विकट मार्ग,
अमरत्व की जगमगाहट है।
तू भस्म नहीं, पावक है तू,
फिर क्यों हताश, क्यों मौन खड़ा?
तेरी अंतर-ज्वाला के आगे,
यह अंबर भी तो न टिका।
उठ, झाड़ रेणु, सम्मुख देख,
रण-भेरी का आह्वान हुआ,
तेरे ही दृढ़ संकल्पों से देख,
नव-इतिहास निर्माण हुआ।