आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

काल-चक्र और पुरुषार्थ

                
                                                         
                            यदि स्खलित हुआ तू पंथ-मध्य,
                                                                 
                            
तो यह न दिशा का अंत समझ,
यह केवल एक विश्राम-क्षण,
पुरुषार्थ का नव-छंद समझ।

जो गिरकर पुनः सँभल न सका,
उस जीवन का उत्कर्ष कहाँ?
आघात सहे बिन जो निखरे,
उस माटी में वह स्पर्श कहाँ?

यह तम की सघन विभीषिका तो,
केवल प्रभात की आहट है,
कंटक-कीर्ण यह विकट मार्ग,
अमरत्व की जगमगाहट है।

तू भस्म नहीं, पावक है तू,
फिर क्यों हताश, क्यों मौन खड़ा?
तेरी अंतर-ज्वाला के आगे,
यह अंबर भी तो न टिका।

उठ, झाड़ रेणु, सम्मुख देख,
रण-भेरी का आह्वान हुआ,
तेरे ही दृढ़ संकल्पों से देख,
नव-इतिहास निर्माण हुआ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर