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छाँव की वसीयत मे स्नेह-संचय वात्सल्य का महादान

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अक्षत माथे पर अंकित है, जीवन भर का समंदर प्यार का,
        
                                                    
                            
पिता का यह निष्काम हृदय, है रूप केवल परोपकार का।
जो कल तक दीपक सा जला, हर राह रौशन करने को,
आज भी वह आतुर खड़ा, खुशियों से झोली भरने को।।
कमाते भले ही हैं बच्चे भले, पर ज़माने की राहें कठोर हैं,
ज़िम्मेदारियों की आँच तेज़,ख़र्चों का चारों ओर शोर है।।।

तभी माँ हौले से आकर, एक संकोच-सी छाँव बनती,
पिता की आँखों में झाँक, बड़े जतन से बातो को बुनाती
"सुनिएजी,अपनी ही तो जड़ें हैं, चाहे शाखाएँ विशाल हो गईं,
पर इस नई हवा की आँच में, इनकी काया निढाल हो गईं।
स्वाभिमान का ओढ़कर दुपट्टा, ये कभी कुछ माँगेंगे नहीं,
पर मेरी ममता जानती है, ये अंदर से पूरी तरह सँभले नहीं।
अपनी पेंशन की गिल्ली-मिट्टी से, जो थोड़ा-सा नीव सँभाल दोगे,
बिना माँगे ही इनके कल पर, एक अमिट सहारा ढाल दोगे।
ना हिसाब का कोई पन्ना खोलना, ना बदले की कोई आस रखनी,
बस इस उड़ते परिंदों के नीड़ में, थोड़ा और सुकूँ की साँस रखनी।"

माँ के ये रेशमी बोल सुन, पिता का कठोर ढाल पिघल गया,
निज संचय का हर एक कतरा, वात्सल्य के सागर में ढल गया।
ना चाह उन्हें पहचान की, ना सम्मान का कोई आडंबर है,
सन्तान सुखी रहे सदा, बस यही उनका पूरा अंबर ही है।
वटवृक्ष सा धूप सहकर, जिसने सदियों छाँव जुटाई है,
पूँजी तो उसकी बस यही, जो घर में हँसी लौट आई है।
संसार के तमाम नाते तो, लेन-देन की तराज़ू में ढलते हैं,
पर माता-पिता के अनाम त्याग से ही, घर के चिराग जलते हैं।
इस निश्छल, विशाल संगम को, नतमस्तक हर एक धाम है,
माता-पिता के इस अलौकिक प्रेम को, शत-शत बार प्रणाम है।
18 घंटे पहले
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