नास्तिकता ईश्वर का विरोध नहीं,
बल्कि उस झूठ का विरोध है,
जिसे मनुष्य
ईश्वर के नाम पर सत्य बना देता है।
ईश्वर को न मानना
शायद उतना बड़ा प्रश्न नहीं,
जितना बिना जाने
किसी बात को सत्य मान लेना।
क्योंकि प्रश्न करना अपराध नहीं,
सत्य की तलाश है।
और हर वह सोच
जो झूठ से पर्दा उठाती है,
वह ईश्वर से नहीं—
अज्ञान से दूर जाती है।
शायद सत्य की सबसे बड़ी पहचान यही है
कि उसे अपने अस्तित्व के लिए
विश्वास की बैसाखी की आवश्यकता नहीं होती।
जो सत्य है,
वह प्रश्नों से डरता नहीं;
और जो झूठ है,
वह अक्सर आस्था का मुखौटा पहनकर
सत्य होने का दावा करता है।
अंततः ईश्वर मिले या न मिले,
मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा
बाहर किसी सत्ता को खोजने की नहीं,
बल्कि अपने भीतर के झूठ को पहचानने की है।
क्योंकि जिस दिन
मनुष्य स्वयं से झूठ बोलना छोड़ देता है,
शायद उसी दिन
वह सत्य के सबसे निकट पहुँच जाता है।
और संभव है—
ईश्वर की खोज का अंतिम पड़ाव भी
किसी मंदिर, ग्रंथ या तर्क में नहीं,
बल्कि उसी निर्मल सत्य में हो
जहाँ मनुष्य
अपने आप से भी कुछ नहीं छिपाता।